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धरमजयगढ़ हाथी प्रभावित क्षेत्र में कोल मंत्रालय द्वारा लगातार कोल ब्लॉक की नीलामी आदिवासियों पर मंडरा रहा खतरा,जल जंगल जमीन को तबाह करने की साजिश?

रायगढ़ जिले के सभी पांच कोल ब्लॉक धरमजयगढ़, घरघोड़ा और तमनार क्षेत्र में; आदिवासी अंचल में विस्थापन और पर्यावरण को लेकर बढ़ी चिंता

रायगढ़/धरमजयगढ़। कोयला खदानों के लगातार विस्तार के बीच रायगढ़ जिले के वनांचल और आदिवासी क्षेत्रों के सामने एक बार फिर जल, जंगल और जमीन के अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है। कोयला मंत्रालय द्वारा नीलामी के लिए जारी नई सूची में छत्तीसगढ़ के पांच कोल ब्लॉक शामिल किए गए हैं और खास बात यह है कि पांचों ब्लॉक रायगढ़ जिले में ही स्थित हैं।कोयला मंत्रालय की सूची के अनुसार CMSP एक्ट के तहत 26वें और MMDR एक्ट के तहत 16वें राउंड की नीलामी में कुल 25 कोल ब्लॉकों को शामिल किया गया है। इनमें छत्तीसगढ़ के पांच ब्लॉक हैं। रायगढ़ जिले से झारपालम टांगरघाट, ग्राम कारीछापर वेस्ट, नवागांव ईस्ट, नवागांव वेस्ट और बायसी को नीलामी के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
बताया गया है कि इन कोल ब्लॉकों की तकनीकी बोलियां 10 नवंबर 2026 को खोली जाएंगी, जबकि 3 दिसंबर से 10 दिसंबर 2026 के बीच इलेक्ट्रॉनिक ऑक्शन प्रस्तावित है।धरमजयगढ़ सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र में इन प्रस्तावित कोल ब्लॉकों का बड़ा हिस्सा धरमजयगढ़ क्षेत्र से जुड़ा बताया जा रहा है। बायसी कोल ब्लॉक का क्षेत्रफल करीब 5.39 वर्ग किमी, नवागांव ईस्ट करीब 14.06 वर्ग किमी और नवागांव वेस्ट करीब 9.42 वर्ग किमी बताया गया है। इन परियोजनाओं के साथ आसपास के गांवों की कृषि भूमि, वन क्षेत्र, जलस्रोत और आबादी पर संभावित प्रभाव को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ रही है। प्रस्तावित सभी ब्लॉकों से करीब 50 वर्ग किमी क्षेत्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खनन गतिविधियों से प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि वास्तविक प्रभावित क्षेत्र परियोजनाओं की स्वीकृत सीमाओं, खनन योजना और भूमि अधिग्रहण/वन संबंधी प्रक्रियाओं के बाद ही स्पष्ट होगा।

कोयले के नाम पर कहीं आदिवासी अंचल ही न उजड़ जाए

धरमजयगढ़ लंबे समय से वन, कृषि और आदिवासी जीवन से जुड़ा क्षेत्र रहा है। यहां जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार, आजीविका, जलस्रोत, पशुपालन और सांस्कृतिक जीवन का आधार हैं। ऐसे में लगातार नए कोल ब्लॉकों की नीलामी से ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि विकास के नाम पर उनकी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों की कीमत कौन चुकाएगा प्रस्तावित खनन क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के सामने भविष्य में भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पुनर्वास, वन अधिकार और ग्रामसभा की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण सवाल खड़े हो सकते हैं। विशेषकर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र और आदिवासी बहुल इलाकों में ग्रामीण इन प्रक्रियाओं को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं।

जल-जंगल-जमीन बचाने की चुनौती

धरमजयगढ़ क्षेत्र में पहले से ही कोयला खनन को लेकर ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के बीच विरोध के स्वर सामने आते रहे हैं। अब नए कोल ब्लॉकों की नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने से यह मुद्दा फिर चर्चा में है ग्रामीणों का कहना है कि जमीन चली गई तो केवल खेत नहीं जाएगा, बल्कि पीढ़ियों से जुड़ी आजीविका और सामाजिक व्यवस्था भी प्रभावित होगी। जंगल खत्म होने का असर जलस्रोतों, वन्यजीवों और स्थानीय पर्यावरण पर पड़ सकता है। ऐसे में खनन परियोजनाओं से पहले प्रभावित ग्रामसभाओं की राय, वन अधिकार दावों और पर्यावरणीय प्रभावों की पारदर्शी जांच महत्वपूर्ण होगी।

धरमजयगढ़ के सामने बड़ा सवाल

क्या विकास की दौड़ में धरमजयगढ़ के जल, जंगल, जमीन और आदिवासी जीवन की कीमत चुकानी पड़ेगी कोल ब्लॉकों की नीलामी केवल सरकारी राजस्व और खनिज उत्पादन का विषय नहीं है। प्रभावित गांवों के लिए यह उनकी जमीन, जंगल, आजीविका और भविष्य से जुड़ा सवाल है। आने वाले समय में इन कोल ब्लॉकों की नीलामी के साथ-साथ ग्रामसभा,वनअधिकार,पर्यावरणीय अनुमति, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की प्रक्रिया पर भी ग्रामीणों और प्रशासन की नजर रहेगी।धरमजयगढ़ के आदिवासी अंचल में अब सवाल सिर्फ कोयले का नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है।

Sajal Kumar Madhu

नेटवर्क कवरेज के साथ Navratna Bharat लेकर आता है आपकी लोकल और राष्ट्रीय खबरें—वास्तविक रिपोर्ट, फील्ड रिपोर्टिंग और विशेषज्ञ विश्लेषण।

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