CFR पर केंद्र-राज्य की दखल से ग्राम सभा के अधिकार पर सवाल, आदिवासी अधिकार मंच ने जताया कड़ा विरोध

नई दिल्ली। सामुदायिक वन संसाधन (CFR) के प्रबंधन को लेकर जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी संयुक्त पत्र ने आदिवासी अधिकारों और ग्राम सभा की स्वायत्तता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच (ARM) ने 28 जुलाई को जारी पत्र का कड़ा विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।वन अधिकार अधिनियम (FRA) और अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम (PESA) के तहत सामुदायिक वन संसाधनों के संबंध में ग्राम सभा को महत्वपूर्ण और केंद्रीय भूमिका प्राप्त है। आरोप है कि नए निर्देशों के माध्यम से CFR प्रबंधन योजना तैयार करने और उसके क्रियान्वयन में राज्य तथा केंद्र के प्रशासनिक तंत्र की भूमिका बढ़ाई जा रही है।पत्र में राज्यों को CFR प्रबंधन योजनाओं की तैयारी की निगरानी के लिए समयबद्ध राज्य स्तरीय कार्ययोजना बनाने तथा केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं एवं वन निधियों के संसाधनों के बीच तालमेल स्थापित करने के निर्देश दिए गए हैं।
आदिवासी अधिकार मंच का आरोप है कि इन प्रावधानों से ग्राम सभा की स्वतंत्र भूमिका कमजोर हो सकती है और सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन में नौकरशाही का हस्तक्षेप बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।
हजारों CFR दावे अब भी लंबित
मंच के अनुसार, वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के कुल 1,79,422 दावों में से 1,24,189 दावों को मंजूरी मिली है, जबकि करीब 57 हजार दावे खारिज या लंबित बताए जा रहे हैं। ऐसे में मंच ने सवाल उठाया है कि पहले से लंबित सामुदायिक वन अधिकारों को प्रभावी रूप से लागू करने के बजाय नई प्रशासनिक व्यवस्था क्यों बनाई जा रही है।ARM ने वन क्षेत्रों में खनन, पर्यटन और अन्य परियोजनाओं के विस्तार तथा वन कानूनों में किए गए बदलावों को भी आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए चुनौती बताया है। मंच का कहना है कि ग्राम सभा, FRA और PESA के अधिकार ही आदिवासी समुदायों की सबसे बड़ी संवैधानिक-कानूनी ताकत हैं।
सितंबर में दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन
आदिवासी अधिकार राष्ट्रीय मंच ने जुलाई के संयुक्त पत्र को वापस लेने की मांग करते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन तेज करने का ऐलान किया है। मंच के अनुसार, आदिवासियों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के मुद्दे को लेकर सितंबर में दिल्ली में बड़े प्रदर्शन का आयोजन किया जाएगा।इस पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि सामुदायिक वन संसाधनों का वास्तविक प्रबंधन ग्राम सभा के हाथ में रहेगा या सरकारी प्रशासनिक तंत्र की भूमिका बढ़ेगी? आने वाले समय में यह मुद्दा आदिवासी अधिकारों और वन प्रबंधन की राजनीति में महत्वपूर्ण बन सकता है।



