हमारे गांव में हमारा राज! ग्रामीणों ने रचा इतिहास — पुरुंगा जनसुनवाई स्थगित, पेसा कानून की ताकत बनी मिसाल,देखे वीडियो

धरमजयगढ़।
मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड (अडानी समूह) की प्रस्तावित पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान परियोजना (869.025 हेक्टेयर) को लेकर चल रहा विवाद आखिरकार ग्रामीणों की एकजुटता के आगे झुक गया। शासन ने पुरुंगा जनसुनवाई को स्थगित करने का निर्णय लिया है। यह फैसला पांचवीं अनुसूची क्षेत्र और छत्तीसगढ़ पेसा कानून 2022 की मिसाल पेश करता हुआ, ग्रामीण एकता की ऐतिहासिक जीत साबित हुआ है।

जनसुनवाई की घोषणा के बाद से ही प्रभावित ग्राम पंचायत पुरुंगा, सामरसिंघा और तेंदुमुरी के ग्रामीणों ने पेसा कानून का हवाला देते हुए विरोध तेज कर दिया था। विशेष ग्राम सभाओं में जनसुनवाई निरस्त करने के प्रस्ताव पारित किए गए। इसके पश्चात ग्रामीण प्रतिनिधि लगभग 100 किलोमीटर की यात्रा कर 22 अक्टूबर को रायगढ़ जिला कलेक्टर से मिले, और प्रस्ताव की प्रति सौंपकर जनसुनवाई निरस्त करने की मांग की थी।
सूत्रों के अनुसार, प्रशासन ने 24 घंटे में कार्रवाई का आश्वासन दिया था, पर 14 दिन बीत जाने के बाद भी कोई निर्णय नहीं लिया गया। इससे आक्रोशित ग्रामीणों ने आंदोलन का रास्ता अपनाया।

गुरुवार 6 अक्टूबर को हजारों की संख्या में ग्रामीण,महिला पुरुष धरमजयगढ़ से रायगढ़ जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। उनके समर्थन में विधायक लालजीत सिंह राठिया, विधायक उमेश पटेल, आदिवासी नेता महेंद्र सिदार सहित सामाजिक कार्यकर्ता जयंत बहिदार, राजेश त्रिपाठी, अनिल अग्रवाल सहित कई जनप्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।
प्रशासन ने कलेक्टोरेट के बाहर कड़ी बैरिकेटिंग कर ग्रामीणों को अंदर प्रवेश से रोका, लेकिन ग्रामीणों का विरोध देर रात तक जारी रहा। रात्रि 9:30 बजे तक ग्रामीण वहीं डटे रहे, और खुले आसमान के नीचे भोजन बनाकर ठहरने की तैयारी करने लगे।

कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने मीडिया से कहा था कि 11 नवंबर की जनसुनवाई निरस्त नहीं की जा सकती पर ग्रामीण संविधान और पेसा कानून के तहत अपनी मांग पर अडिग रहे।
अगले दिन सुबह फिर वही नारे गूंजे —अडानी की जनसुनवाई निरस्त करो!हमारे गांव में हमारा राज!ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मिलने की अपील की, लेकिन कलेक्टर के न मिलने से आक्रोश और गहराया। निराश ग्रामीण देर शाम बैरंग लौटे, पर आंदोलन थमा नहीं।
8 नवंबर को प्रभावित गांवों में सामूहिक बैठक हुई, जहां ग्रामीणों ने दोबारा पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची की शक्ति का हवाला देते हुए आंदोलन जारी रखने का निर्णय लिया।उसके बाद जनसुनवाई स्थल के मार्गों को ग्रामीणों ने शांतिपूर्ण ढंग से बंद कर दिया, ताकि कोई प्रशासनिक दल वहां न पहुंच सके। महिला, पुरुष और युवाओं ने जंगलों में डेरा डाल लिया, रात में आग जलाकर ठंड से जूझते हुए पहरा देते रहे।
विरोध पूरी तरह शांतिपूर्ण लेकिन बुलंद आवाज़ वाला रहा — जनसुनवाई रद्द करो, हमारे गांव में हमारा राज।
अंततः प्रशासन को ग्रामीणों की मांग के आगे झुकना पड़ा और 11 नवंबर की जनसुनवाई स्थगित कर दी गई।
अब पुरुंगा, सामरसिंघा और तेंदुमुरी के ग्रामीणों का यह आंदोलन पूरे छत्तीसगढ़ में चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों की एकजुटता और संवैधानिक अधिकारों की समझ ने पेसा कानून के अनुपालन की मिसाल कायम की है।
हमारे गांव में हमारा राज — यह नारा अब धरमजयगढ़ से गूंजकर पूरे प्रदेश में प्रेरणा बन गया है।



