जनता की जमीन अच्छी या उद्योगों की गोद?

(धरमजयगढ़ से विशेष रिपोर्ट)
धरमजयगढ़ के कई सरकारी विभागों में फर्जी बिलों के भुगतान के मामलो में अनियमितताओं की चर्चा आम हो गई है लेकिन हैरानी की बात की है कि इन विषयों पर मौन साधे हुए एक गोदी पत्रकार हैं जो खुद को निष्पक्षता का प्रतीक बताते नहीं थमते।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार का अंधेरा चारों ओर फैला है — एक गोदी पत्रकार” चुप क्यों हैं?
वो पत्रकार, जो खुद को निष्पक्षता का मसीहा बताकर गप्पे झाड़ते कही भी ज्ञान बांटते नहीं थकते, जनता के टैक्स से निकले लाखों रुपये विज्ञापनों और बिलों के नाम पर हजम कर लिए गए, मगर पत्रकारिता का धर्म निभाने वाला कोई नहीं दिखता।
धरमजयगढ़ में जब जब जनसुनवाई हुई, तब तब एक कथित पत्रकार घर बैठे “कल्पनाओं की खबरें” गढ़ते रहे। उन्हें यह तक नहीं पता कि ग्रामीणों ने पर्यावरण, रोज़गार और विस्थापन पर क्या सवाल उठाए,अब जनता भी समझ चुकी है — जो सच के साथ नहीं, वह जनता के खिलाफ है,पत्रकारिता का असली अर्थ सत्ता की गोद में बैठना नहीं, बल्कि जनता के हक़ में खड़ा होना है।
धरमजयगढ़ पुरुंगा की जनता अब पूछ रही है — क्या एक गोदी मीडिया” अब जनता की आवाज़ दबाने का नया औजार बन चुका है?
सच को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।
धरमजयगढ़ की जनता अब जाग चुकी है — और इस बार सवाल एक गोदी पत्रकार से है।



