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धरमजयगढ़ के पुरुंगा में अडानी कोल ब्लॉक के खिलाफ ग्राम सभा का आंदोलन हुआ तेज महिलाओं का जनसैलाब — जनसुनवाई के विरोध में फूटा आक्रोश

धरमजयगढ़।
धरमजयगढ़ ब्लॉक के पुरुंगा गांव में प्रस्तावित मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड (अडानी ग्रुप) की 869.025 हेक्टेयर भूमिगत कोयला खदान परियोजना का विरोध थमने का नाम नहीं इस विरोध में महिलाओं सहित ग्रामीणों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। आगामी 11 नवंबर को प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर ग्राम पुरुंगा, तेंदुमुरी और सामरसिंघा के ग्रामीणों ने जनसैलाब के रूप में विरोध दर्ज कराया।


ग्रामीणों ने पेसा कानून के तहत विशेष ग्राम सभा आयोजित कर सर्वसम्मति से जनसुनवाई निरस्त करने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 22 अक्टूबर को हजारों महिला-पुरुष रायगढ़ जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और नारेबाजी करते हुए जनसुनवाई को रद्द करने की मांग की। विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने कहा कि अडानी समूह की यह परियोजना क्षेत्र की वन संपदा, आदिवासी संस्कृति और हाथियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देगी।
विरोध के बीच प्रशासन ने 24 घंटे का समय मांगते हुए विचार करने की बात कही। वहीं 23 अक्टूबर को धरमजयगढ़ जनपद पंचायत सभाकक्ष में एस.डी.एम. प्रवीण भगत की अध्यक्षता में बैठक रखी गई, जिसमें अडानी समूह के कर्मचारी, पंचायत प्रतिनिधि और बीडीसी सदस्य उपस्थित रहे।

बैठक के बाद प्रशासन के जनसंपर्क अधिकारी द्वारा यह खबर जारी की गई कि ग्रामीण जनसुनवाई के लिए सहमत हैं। यह खबर फैलते ही तीनों प्रभावित ग्राम पंचायतों में भारी नाराज़गी देखी गई।*

धरमजयगढ़ में इसके विरोध में 29 अक्टूबर को ग्रामीणों ने संविधान की प्रति हाथ में लेकर मौन रैली निकाली और पेसा कानून के तहत ग्राम सभा के अधिकारों के पालन की मांग को लेकर एस.डी.एम., वन विभाग और जनपद पंचायत को ज्ञापन सौंपा।

धरमजयगढ़ ब्लॉक के पुरुंगा गांव में आयोजित बड़ी सभा में क्षेत्रीय विधायक लालजीत सिंह राठिया, रामपुर विधायक फूल सिंह राठिया, जनपद सदस्य, सरपंच, पंच सहित भारी संख्या में महिलाएं और पुरुष उपस्थित रहे। दोनों विधायकों ने स्पष्ट कहा कि हम ग्रामीणों के साथ हैं, किसी भी कीमत पर 11 नवंबर की जनसुनवाई नहीं होने देंगे।”


सभा में सभी ने गांधीवादी तरीके से आंदोलन जारी रखने का संकल्प लिया और आगामी रणनीति तय की।
बताया जा रहा है कि पुरुंगा और आसपास का पूरा क्षेत्र पांचवीं अनुसूची क्षेत्र है, जो पेसा कानून के दायरे में आता है। यह इलाका हाथी प्रभावित और घने जंगलों से घिरा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि खदान खुलने से न केवल पर्यावरणीय असंतुलन पैदा होगा, बल्कि हाथियों का आवास क्षेत्र और स्थानीय आदिवासी जीवन भी प्रभावित होगा।


अब देखना यह होगा कि प्रशासन ग्राम सभाओं के विरोध और राजनीतिक समर्थन के बावजूद 11 नवंबर की जनसुनवाई कराता है या इसे निरस्त करता है।
आगामी कुछ दिन धरमजयगढ़ के इस आंदोलन की दिशा तय करेंगे।

Sajal Kumar Madhu

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